जय गुरुदेव , अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक राजाधिराज श्री श्री अनंत विभूषित श्री गोमातिदास्जी महाराज गुरुदेव भगवन के चरणों में समस्त परिवार सहित अनंत अनंत कोटि पबार सादर प्रणाम करता हूँ। गुरुदेव की कृपा हम सब भक्तों पर हमेशा बरसती रहे , यही मंगलकामना करता हूँ। तपस्वी संत गौमती दास महाराज (सागर वालों) का जन्म बिहार राज्य की तहसील आंसमा पोस्ट पकरी वर्मा के ग्राम बुधोली में हुआ था। इनके जन्म का नाम शिवकुमार था। पिता का नाम रघुनंदन दास जी व माता का नाम श्रीमती जानकी देवी था। बाल्य अवस्था में इनके माता-पिता का देहांत हो गया था। इनका लालन-पालन बुआजी की छत्र-छाया में हुआ। बालक शिवकुमार प्रारंभ से ही विलक्षण प्रतिभाओं से विभूषित थे। इन्हें बच्चों की टोली में खेलना पसंद नहीं था। इन्हें स्कूल भेजा जाता, लेकिन ये स्कूल न जाकर गांव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे हनुमानजी के मंदिर में पूजा करने लग जाते थे। यह भक्तिभाव इतना प्रबल हुआ कि 7 वर्ष की आयु में ही ये घर त्यागकर आसनपुर चले गए। वहां इन्होंने कोयले की खान में कार्य किया। यहां इनकी भेंट साधुओं की जमात से हो गई इसी जमात के साथ ये भी चल दिए। इन्होंने मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर पहुंचकर महंत रामचरण दास महाराज से राम जानकी मंदिर खैरवा में मंत्र दीक्षा व 12 वर्ष की आयु में महात्यागी बाबा राममोहन दास महाराज से गोमती गंगा के किनारे वैराग्य की दीक्षा प्राप्त की। यहीं पर इनका नामकरण गोमतीदास हुआ। इन्होंने कई स्थानों पर तपस्या करते हुए बद्रीनाथ, कामा, वैर, गिरनार, उधमपुर, कटरा, अयोध्या के अलावा सागर (तिमनगढ़), करौली और हिंडौन आदि  अनगिनत स्थानों  पर संत  आश्रमों की स्थापना की। गोमतीदासजी महाराज  राजस्थान में सर्वप्रथम हिंडौन के कस्बा सूरौठ आए। इसके बाद मासलपुर के तपोस्थान सागर पहुंचे और यहां वर्षों तक तपस्या की। सागर स्थित अनारखो गुफा में  माता की कठिन साधना की , इन्होंने वर्ष 1970 में सागर पर यज्ञ करवाया। इसी कारण इन्हें सागर वाले बाबा कहकर भी भक्त पुकारने लगे। सागर के भंडारे के दौरान आयोजकों के पास घी कम पद गया , वे घबराये और महाराजजी के पास आये और उन्हें बताया की महाराज इस जंगल मैं और घी कहाँ से लायें , घी समय पर नहीं मिला तो साधु संत अवं भक्तों की प्रसादी कैसे बनेगी , महाराजजी ने कहा भय्या सागर से पीपों मैं जल भरकर कड़ी मैं दल दो और कम हो जाये तब कल आकर उतना ही घी सागर मैं चद देना। आयोजकों ने डरते डरते सागर से जल लाकर कड़ी मैं डाला , तत्काल ही जल घी बन गया , सारा आकाश महाराज जी के जयकारों से गुंजायमान हो गया।  उस भंडारे के प्रत्यक्षदर्शी  आज भी जब इसे यद् करते हैं तो महाराजजी के प्रति श्रद्दा से भर जाते हैं। 
 इन्होंने हिंडौन में भी विशाल यज्ञ करवाया। वर्ष 1952 में करौली और हिंडौन आए। हिंडौन में इन्होंने नक्कश की देवी का मंदिर और करौली में गौमती कॉलोनी का निर्माण कराया। हिंडौन में नक्कश की देवी मंदिर के पास ही आश्रम के साथ गौशाला और राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल नंबर एक का विशाल विद्यालय भवन का निर्माण कराया। 

इन्हें राज्य सरकार की ओर से भामाशाह पुरस्कार की भी घोषणा की गई, लेकिन महाराज श्री पुरस्कार लेने नहीं पहुंचे। इन्होंने गरीब बालिकाओं को पढ़ाने, उन्हें उचित मार्ग दर्शन देने, विवाह योग्य गरीब युवतियों के विवाह कराने आदि जैसे भी कई सामाजिक उद्धार के पुनीत कार्य किए। इनके पूर्वी राजस्थान सहित प्रदेश के कई अंचलों में लाखों शिष्य हैं।साथ ही इनके भक्त पुरे विश्व में हैं इसका मुझे कई बार अनुभव हुआ है। 
       महाराजजी का छोटा पॉकेट कार्ड बनवाकर महाराजजी को दिखाया और मैंने महाराजजी से पूछा महाराजजी ऐसे कार्ड कितने और  मंगवाएं , महाराजजी बोले पूरे संसार मैं कितना आदमी रहता है , मैं बोंला महाराजजी   

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