धामनिष्ठा : अयोध्या से बाहर नहीं जाते संत

WEDNESDAY, 18 JULY 2012 23:05
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अयोध्या, धाम हमें पकड़े रहता है जबकि भगवान का नाम, उनके रूप व लीलाओं का हमें चिंतन करना पड़ता है। रामकथा के व्याख्याता लक्ष्मणकिलाधीश स्वामी सीताराम शरण महाराज का यह अनुभव रामनगरी की एक विशिष्ट परंपरा को रेखांकित करने वाला रहा है। धर्मनगरी में कई ऐसे मंदिर हैं जिनके आचार्य आजीवन मंदिर परिधि से बाहर नहीं जाते हैं। यहां ऐसे साधकों-संतों की परंपरा भी है जो धाम निष्ठा के चलते अयोध्या से बाहर न जाने का संकल्प लेकर प्रभु की आराधना में ही पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं।
रामनगरी के सिद्ध संतों की श्रृंखला में स्वामी युगलानन्य शरण ऐसे ही महान संत हुए। उन्होंने सरयूतट पर रहकर भगवान श्रीसीताराम की मधुर भाव से उपासना की। आपकी तपस्या से प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने अयोध्या के सरयूतट पर 40 बीघा भूमि ताम्र पत्र पर लिखकर दे दिया। वर्तमान में इस भूमि पर आचार्यपीठ लक्ष्मण किला स्थापित है। महाराज श्री स्वप्न में भी अयोध्या से बाहर जाना पसंद नहीं करते थे। एक बार वे स्वप्न में जगन्नाथ भगवान का दर्शन करने पुरी पहुंच गए। इसी दौरान इन्हें धाम छूटने का अनुभव हुआ और वे स्वप्न में ही रोने लगे। इस पर भगवान जगन्नाथ ने उनकी भावना को समझ कर कहा कि मैं ही राम हूं? इसके बाद भी स्वामी युगलानन्य शरण को धाम निष्ठा भंग होने का दु:ख रहा। वे स्वप्न से उठे तो उनका पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ था। महाराज श्री के अपनी सौ की करीब पुस्तकों में एक धाम कांति में इस घटना का जिक्र किया था। सन् 1877 में मात्र 59 वर्ष की अवस्था में आपने इस नश्वर शरीर का त्याग कर साकेतधाम को प्रस्थान कर दिया।

रघुनाथ दास जी की बड़ी छावनी, श्यामा सदन, हनुमत सदन आदि कुछ ऐसे स्थान हैं जिनके महंत आजीवन मंदिर परिसर अथवा अयोध्या से बाहर नहीं जाते हैं। कुछ ऐसे संत हुए जिन्होंने संकल्प लेकर आजीवन धाम निष्ठा का पालन किया। हनुमत निवास के संस्थापक आचार्य व सिद्ध संतों में अग्रणी गोमती दास महाराज इसी निष्ठा के वाहक रहे। हनुमत निवास के पास रहने वाले स्वामी रामकिशोर शरण उर्फ कोठा वाले महाराज का नाम ऐसे ही संतों में प्रमुख है। हनुमानगढ़ी के सिद्ध संत गंगाधर ब्रह्माचारी ने भी आजीवन इस निष्ठा का पालन किया। परंपरा है कि हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महंत आजीवन हनुमानगढ़ी मंदिर के 52 बीघे के परिसर से बाहर नहीं जाते हैं। पीठ के वर्तमान गद्दीनशीन महंत इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। सरयूतट निवासी सिद्ध संत रूपकला महाराज ने आजीवन धामनिष्ठा का पालन कर भगवान श्रीसीताराम की विशेष कृपा प्राप्त की। महात्मा बनादास भी इसी परंपरा के वाहक रहे। रसमोध कुंज के महंत सियाछबीली शरण संकल्प वश इसी निष्ठा का पालन कर रहे हैं। श्रीरामवल्लभाकुंज के संत बाबा केशव दास साढ़े तीन दशक से धाम निष्ठा का पालन कर रहे हैं। वे इलाज आदि अवसरों को छोड़ मंदिर परिसर से भी बाहर नहीं निकलते। रामनगरी के युवा आचार्य व गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध कर रहे महेशचंद्र मिश्र कहते हैं भगवान श्रीराम की तरह उनके भक्तों के भाव बहुत गहरे हैं। हम मात्र थोड़ा-बहुत अनुभव कर पाते हैं।

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